Monday, August 22, 2011

कंचन सा तपने देश खड़ा

कंचन सा तपने देश खड़ा,
हर राह से उठता उठता शोर बड़ा,
आँखों में देखो आज यहाँ ललाई है,
परिवर्तन देश में लाने कि ऋतू आयी है|


हर हाथ तिरंगा लिए खड़ा,
गांधी टोपी फिर आज अड़ा,
भारत माँ ने चूड़ी फिर खनकाई है,
परिवर्तन देश में लाने कि ऋतू आयी है|


दाने बिन अन्ना वहां पड़ा,
हर युवक सीना तान खड़ा,
भ्रष्टाचार की फसल पर आंधी आई है,
परिवर्तन देश में लाने कि ऋतू आयी है|


सरकारी अमला फंसा पड़ा,
बैठा नेता का चैन उड़ा,
अन्ना ने मनमोहन की नींद उडाई है,
परिवर्तन देश में लाने कि ऋतू आयी है|


राजेश अमरनाथ पाण्डेय 
२२-०८-२०११

Wednesday, April 6, 2011

कुछ इस प्रकार लेखनी चला कि आग ना लगे,
मगर यहीं से देख देश जल उठे|

बदन कहीं जले नहीं मगर ह्रदय झुलस उठे,
कोई तू इस प्रकार की पुकार दे |

Friday, March 26, 2010

Safed Dudhi aur Kaali Syahi

लकड़ी की काली पटरी से सफ़ेद कागज़ के पन्नो का सफ़र बड़ा ही अजीब सा रहा.
पटरी भले ही काली रही ह़ो पर लिखने वाला ह्रदय हमेशा श्वेत ही रहा है,
क्यों कि कलम एक बच्चे के हाथों में रहा करती है,

कागज के सफ़ेद पन्ने भले ही दाग रहित रहा करते ह़ो, पर ................
लिखने वाले हाथ दुनिया के अजब-गजब ढंगों को जानने वाले काली करतूतों को छुपाने वाले,
काले कलम से लिखे जाने वाले हुआ करते हैं.

फर्क है एक बच्चे में और एक दुनियादारी से मंजे हुए दिमाग के बीच.
इसीलिए बड़ी बड़ी कहानियां काली स्याही से लिखी जातीं हैं शायद....

Friday, January 1, 2010

खुशबू

खुशबू

उसके गुजरने के बाद,
मेरे करीब से गुजरता हुआ लम्हां थम सा गया,
मेरे दिमाग में बस वो रह गई....
और उसके जुल्फों की "खुशबू".

राजेश अमरनाथ पाण्डेय
२/०७/१९९७