Wednesday, April 6, 2011

कुछ इस प्रकार लेखनी चला कि आग ना लगे,
मगर यहीं से देख देश जल उठे|

बदन कहीं जले नहीं मगर ह्रदय झुलस उठे,
कोई तू इस प्रकार की पुकार दे |

Friday, March 26, 2010

सफ़ेद दुधी और काली स्याही

सफ़ेद दुधी और काली स्याही 

लकड़ी की काली पटरी से सफ़ेद कागज़ के पन्नो का सफ़र बड़ा ही अजीब सा रहा.
पटरी भले ही काली रही ह़ो पर लिखने वाला ह्रदय हमेशा श्वेत ही रहा है,
क्यों कि कलम एक बच्चे के हाथों में रहा करती है,

कागज के सफ़ेद पन्ने भले ही दाग रहित रहा करते ह़ो, पर ................
लिखने वाले हाथ दुनिया के अजब-गजब ढंगों को जानने वाले काली करतूतों को छुपाने वाले,
काले कलम से लिखे जाने वाले हुआ करते हैं.

फर्क है एक बच्चे में और एक दुनियादारी से मंजे हुए दिमाग के बीच.
इसीलिए बड़ी बड़ी कहानियां काली स्याही से लिखी जातीं हैं शायद....

Friday, January 1, 2010

खुशबू

खुशबू

उसके गुजरने के बाद,
मेरे करीब से गुजरता हुआ लम्हां थम सा गया,
मेरे दिमाग में बस वो रह गई....
और उसके जुल्फों की "खुशबू".

राजेश अमरनाथ पाण्डेय
२/०७/१९९७

धर्मयुद्ध

धर्मयुद्ध
 इस किताब के अंतिम पृष्ठों से
न जाने क्यों "सड़ांध" सी,
श्वास छिद्रों में प्रविष्ट होती है,

पागल कर देती है अपने,
अनदेखे अनजान कड़े हाथों से.
दबा कर मेरे स्वप्नों का गला,

निकाल देती हैं रस,
यादों के मधुर उपवन से
कुंठित किये दे रही हैं,
समुचित सुद्रिश विचारधारा को,
जो कभी "अरिहंता" कही जाती थी,

अरि के नाम पर आज मेरे अपने,
विचारों के सैनिक, करोडो कि संख्या में,
मुझसे ही युद्ध करने को हैं तत्पर,

अब मुझे युद्धरत होना होगा,
अपनों से, अपने विचारों से, अपने अस्तित्व से,
जो कौरव सेना कि तरह घेरे खड़ी हैं,
मेरी आत्मा को आक्रमण को तत्पर,

आज मुझे एक "माधव" की आवश्यकता है,
जो आधुनिक "गीता" लिखे,
आत्मयुद्ध पर, 
न कि धर्मयुद्ध पर.......... 

राजेश अमरनाथ पाण्डेय 
१९-१०-१९९५